राजा भोज के भोजप्रबंध में लिखा है कि – रतन टाटा के कुत्ते का नाम जुड़ा है, मशहूर शहर के नाम पर है
घटयेकया कोशदशैकमश्व: सुकृत्रिमो गच्छति चारुगत्या ।
वायुं ददाति व्यजनं सुपुष्कलं विना मनुष्येण चलत्यजस्त्रम ॥
राजा भोज के राज्य में और समीप ऐसे-ऐसे शिल्पी लोग थे कि जिन्होंने घोड़े के आकार का एक यान यंत्रकलायुक्त बनाया था कि जो एक कच्ची घड़ी में ग्यारह कोश और एक घण्टे में साढ़े सत्ताईस कोश जाता था । वह भूमि और अन्तरिक्ष में भी चलता था । और दूसरा पंखा ऐसा बनाया था कि विना मनुष्य के चलाये कलायन्त्र के बल से नित्य चला करता और पुष्कल वायु देता था । जो ये दोनों पदार्थ आज तक बने रहते तो यूरोपियन इतने अभिमान में न चढ़ जाते । सत्यार्थ-प्रकाश में यह बात स्वामी दयानन्द ऐसा लिखते है । – सत्यार्थ प्रकाश 11वां समुल्लास 275 पृष्ठ"रुद्रवंती" एक अमूल्य औषधि दोआबा की धरा में छिपी है
यदि हम राजा भोज के ग्रंथ समरागणसूत्रधार पर दृष्टि डाले तो इंजीनियर राजा भोज की वैज्ञानिक दृष्टि स्पष्ट नजर आती है। इस ग्रंथ का 31वां अध्याय ‘यंत्रविज्ञान’ से सम्बद्ध है। इस अध्याय में यंत्र, उसके भेद और विविध यंत्रनिर्माण-पद्धति पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। राजा भोज के अनुसार यंत्र उसे कहा गया है जो स्वेच्छा से चलते हुए(पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु,आकाश आदि) भूतों को नियम से बांधकर अपनी इच्छानुसार चलाया जाय ।
स्वयं वाहकमेकं स्यात्सकृत्प्रेर्यं तथा परम् ।
अन्यदन्तरितं बाह्यं बाह्यमन्यत्वदूरत: ॥
इन तत्वों से निर्मित यंत्रों के विविध भेद है। जैसे :-100 ग्राम गुड़ से कैसे दे सकते हैं वायु प्रदूषण को शिकस्त-जानिये...
(1) स्वयं चलने वाला,
(2) एक बार चला देने पर निरंतर चलता रहने वाला,
(3) दूर से गुप्त शक्ति से चलाया जाने वाला तथा
(4) समीपस्थ होकर चलाया जाने वाला।
भोज ने यंत्रनिर्मित कुछ वस्तुओं का विवरण भी दिया है। यंत्रयुक्त हाथी चिंघाडता तथा चलता हुआ प्रतीत होता है। शुक आदि पक्षी भी ताल के अनुसार नृत्य करते है तथा पाठ करते है। पुतली,हाथी,घोडा,बंदर आदि भी अंगसंचालन करते हुए ताल के अनुसार नृत्य करते मनोहर लगते है। उस समय बना एक यंत्रनिर्मित पुतला नियुक्त किया था। वह पुतला जो राजा भोज कहना चाहते थे वह कह देता था। SIP क्या है, निवेश कैसे करे? (SIP meaning in Hindi)
भोज की गोष्ठी में जमे लोगों की आंखे आश्चर्य से फटी की फटी रह जाती है- पुतला भी कहीं बोलता है और वही वस्तु जो कहलवाना चाहे? यह न सिर्फ उस समय की अद्भुत मशीन थी बल्कि आज भी आश्चर्यकारी है। इससे स्पष्ट है कि भोज की वैज्ञानिक प्रयोगशाला समृद्ध,विशाल तथा अद्भुत थी। इसके अलावा विमान निर्माण की प्रक्रिया प्राचीन कल में ज्ञात थी।
ऋग्वेद में विमान विद्या के अनेकों मंत्र है। जिस प्रकार चंपूरामायण में सेतुनिर्माण से पूर्व सर्वेक्षण कर कील या स्तम्भ गाड़ दिये जाने की बात है उसी प्रकार पुराणों तथा रामायण में विमानों व विमान-युद्ध के उल्लेख प्राप्त होते है। कालिदास ने भी आकाश-यात्रा के सात-साधनों तथा सात-आकाश-पथों आदि का अपने साहित्य में उल्लेख किया है।आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के साथ कोरोना संक्रमण को मात
विमान-विद्या के ग्रंथ प्राचीन समय में सुलभ थे। भोज ने विमान बनाने की प्रक्रिया की रूपरेखा का संकेत किया है। उसके अनुसार हल्की लकड़ी का बड़ा-सा पक्षी बनाकर, उसके पेट में पारे का यंत्र लगाकर नीचे की और अग्निपात्र रखा जाए। पक्षी के अंगजोड़ सर्वथा बंद होने चाहिए। नीचे के लोहकुंड में रखी आग से पारे के गरम होने पर विमान गर्जन करता हुआ उड़ने लगता है। ऑनलाइन चेक आउट फाइनेंस क्या होता है, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के लिए कैसे है वरदान…
वैदिक ज्ञान- विज्ञान से युक्त होकर सारा विश्व फिर से भौतिक व आध्यात्मिक उन्नति समान रूप से कर सके। पूरे संसार को याद रखना चाहिए कि आज संसार में जो भी वैज्ञानिक आविष्कार हुए है या आगे होंगे उन सबका आदि मूल वेद व आर्यावर्त ही है। - आलोक आर्य



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